लेखक परिचय
जयशंकर प्रसाद एक युग प्रवर्तक रचनाकार थे जिन्होंने एक साथ कविता , नाटक , कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिन्दी को गौरवान्वित करने वाली कृतियों का सृजन किया । आधुनिक हिन्दी हिन्दी साहित्य के इतिहास में प्रसाद का गौरव अक्षुण्ण है। काशी के प्रसिद्ध 'सूंंघनी साहू' परिवार में जन्म आरम्भिक शिक्षा और जीवन समृद्धता से प्रारम्भ हुआ , किन्तु 17 वर्ष की उम्र में प्रसाद पर आपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा । प्रसाद ने धीरता और गम्भीरता से विषमताओं का सामना किया ।
प्रसाद के साहित्य में प्रकृति के सचेतन रूप के साथ - साथ मानव के लौकिक व पारलौकिक जीवन की जैसी विविधतापूर्ण झाँकी प्रस्तुत की गयी है , वैसी आधुनिक युग के अन्य किसी कवि में नहीं मिलती है । कवि के रूप में वे निराला , पन्त महादेवी के साथ छायावाद के चौथे स्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित हुए । नाट्य लेखन में स्वर्णिम इतिहास को आधार बनाकर गौरवशाली भारतवर्ष का रेखांकन कर उस समय के जनमानस में आत्म चेतना का संचार किया । कहानी और उपन्यास के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक अनावृत पक्षों का उद्घाटन किया ।
कृतियाँ
कानन कुसुम , महाराणा का महत्व , झरना ,आँसू लहर , कामायनी ( काव्य ) , स्कदगुप्त , चन्द्रगुप्त , ध्रुवस्वामिनी , जनमेजय का नागयज्ञ , राज्यश्री ( नाटक ), छाया, प्रतिध्वनि , आकाशदीप , आंधी, इन्दजाल ( कहानी संग्रह ) , कंकाल , तितली , इरावती ( उपन्यास ) ।
पाठ परिचय -
प्रस्तुत कहानी का मुख्य पात्र एक छटा लड़का है । जो अपनी असहाय अवस्था में आजीविका के लिए जादू के करतब दिखाता है तथा लेखक के सामने भी अपनी कला का प्रदर्शन करता है । अपनी दीन स्थिति में भी किसी के सामने हाथ न फैलाकर जीवन के संघर्षों का साहस के साथ मुकाबला करके स्वाभिमान पूर्वक जीवन जीने का प्रयास करता है । बाल सुलभ करूणा के साथ दायित्व बोध इस बालक के माध्यम से प्रसाद ने कहानी में जीवन्त किया है । छोटा जादगर के नाम से सम्बोधित करने को कहना उस लड़के की अपने कर्म के प्रति दृढ़ता और निष्ठा का परिचायक है । इसी कारण मुख्य पात्र की विपन्नावस्था में भी पाठकों के मन में सहानुभूति से अधिक आदर की भावना उत्पन्न होती है । कहानी मानवीय संवेदनाओं को झंकृत करने में भाव एवं भाषा की दृष्टि से समर्थ है ।
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जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ #1
छोटा जादूगर
( 1 )
" कार्निवाल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी । में खड़ा था फुहारे के पास , जहाँ एक लड़का चुपचाप शरबत पीनेवालों को देख रहा था । उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी - सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे । उसके मुंह पर गम्भीर विवाद के साथ धैर्य की रेखाएँ थी । मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ !
" मैंने पूछा , क्यों जी , तुमने इसमें क्या देखा ? "
" मैने सब देखा है । यहाँ चूड़ी फेंकते हैं । खिलौनों पर निशाना लगाते है । तीर से नम्बर छेदते हैं । मुझे तो खिलौने पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ । जादूगर तो बिल्कुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताश का खेल में ही दिखा सकता हूँ । " उसने बड़ी प्रगल्भता से कहा ।
"नहीं , वहाँ मैं नहीं जा सकता । टिकट लगता है ।"
मैंने कहा , " तो चलो , मैं यहाँ पर तुनको ले चलूँ ।"
उसने कहा - " वहाँ जाकर क्या कीजिएगा ? चलिए निशाना लगाया जाये । "
मैंने उससे सहमत होकर कहा - " तो फिर चलो , पहले शरबत पी लिया जाये । "
हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले । राह में ही उससे पूछा , " तुम्हारे और कौन हैं? "
"माँ और बाबूजी। "
" उन्होंने तुमको यहाँ आने के लिये मना नहीं किया ? "
" बाबूजी जेल में है । "
"क्यों ? "
" देश के लिये , वह गर्व से बोला ।
" और तुम्हारी माँ । "
" वह बीमार है । "
"और तुम तमाशा देख रहे हो ? "
उसके मुंह पर तिरस्कार की हँसी फूट पड़ी । उसने कहा , तमाशा देखने नहीं , दिखाने आया है । कुछ पैसे ले जाऊँगा , तो माँ को पथ्य दूंगा । मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता , तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती । "
मैं आश्चर्य से उस तेरह - चौदह वर्ष के बालक को देखने लगा ।
" हाँ , मैं सच कहता हूँ , बाबूजी ! माँ बीमार है , इसलिये मैं नहीं गया |"
"कहाँ ? "
"जेल में! जब कुछ लोग खेल-तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्यों न दिखाकर मां की दवा करूं और अपना पेट भरूं।''
मैंने दीर्घ नि:श्वास लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्यग्र हो उठा। मैंने उससे कहा, ''अच्छा चलो, निशाना लगाया जाए।''
हम दोनों उस जगह पर पहुंचे जहां खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए।
वह निकला पक्का निशानेबाज। उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखनेवाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रूमाल में बँधे, कुछ जेब में रख लिये गए।
लड़के ने कहा, ''बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊंगा। बाहर आइए, मैं चलता हूं।'' वह नौ-दो ग्यारह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा, 'इतनी जल्दी आंख बदल गई!"
में घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता-देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। अकस्मात् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा, ''बाबूजी!"
मैंने पूछा, ''कौन?"
''मैं हूं छोटा जादूगर।''
(2)
कलकत्ते के सुरम्य बोटैनिकल-उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने का खादी का झोला, साफ जांघिया और आधी बांहों का कुरता। सिर पर मेरी रूमाल सूत की रस्सी से बँधी हुई थी। मस्तानी चाल में झूमता हुआ आकर वह कहने लगा -
''बाबूजी, नमस्ते! आज कहिए तो खेल दिखाऊं?"
''नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।''
''फिर इसके बाद क्या गाना-बजाना होगा, बाबूजी?"
''नहीं जी, तुमको....'' क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमतीजी ने कहा, ''दिखलाओ जी, तुम तो अच्छे आए। भला, कुछ मन तो बहले।'' मैं चुप हो गया, क्योंकि श्रीमतीजी की वाणी में वह मां की-सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरंभ किया।
उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्ली रूठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हंसते लोट-पोट हो गए।
मैं सोच रहा था। बालक को आवश्यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।
ताश के सब पत्ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा, ''अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जाएंगे।''
श्रीमतीजी ने धीरे से उसे एक रूपया दे दिया। वह उछल उठा।
मैंने कहा, ''लड़के!"
''छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।''
मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमतीजी ने कहा, ''अच्छा, तुम इस रुपए से क्या करोगे?"
''पहले भरपेट पकौड़ी खाऊंगा। फिर एक सूती कंबल लूंगा।''
मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा, 'ओह! कितना स्वार्थी हूं मैं। उसके एक रुपया पाने पर मैं ईर्ष्या करने लगा था न!"
वह नमस्कार करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले।
उस छोटे से बनावटी जंगल में संध्या सांय-सांय करने लगी थी। अस्ताचलगामी सूर्य की अंतिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक शांत वातावरण था। हम लोग धीरे-धीरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे।
रह-रहकर छोटा जादूगर स्मरण हो आता था। तभी सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कंबल कंधे पर डाले मिल गया। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा, ''तुम यहां कहां?"
''मेरी मां यहीं है न! अब उसे अस्पताल वालों ने निकाल दिया है।'' मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा तो एक स्त्री चिथड़ों से लदी हुई कांप रही थी।
छोटे जादूगर ने कंबल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिमटते हुए कहा, ''मां!"
मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े।
(3)
बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने ऑफिस में समय से पहुंचना था। कलकत्ते से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्छा हुई। साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता तो और भी.... मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्द लौट आना था।
दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मैं मोटर रोककर उतर पड़ा। वहां बिल्ली रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्याह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्नता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हंसाने की चेष्टा कर रहा था, तब जैसे स्वयं कांप जाता था। मानो उसके रोएं रो रहे थे। मैं आश्चर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण भर के लिए स्फूर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा, ''आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं?"
''मां ने कहा है कि आज तुरंत चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है।'' अविचल भाव से उसने कहा।
''तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए!" मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्य के सुख-दु:ख का माप अपना ही साधन तो है। उसके अनुपात से वह तुलना करता है।
उसके मुंह पर वहीं परिचित तिरस्कार की रेखा फूट पड़ी।
उसने कहा, ''क्यों न आता?"
और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।क्षण भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा, ''जल्दी चलो।'' मोटरवाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा।
कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुंचा। जादूगर दौड़कर झोंपड़े में मां-मां पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किंतु स्त्री के मुंह से, 'बे...' निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्तब्ध था। उस उज्ज्वल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्य करने लगा।

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